सनातन धर्म में गणेश चतुर्थी का पर्व भगवान गणेश को समर्पित सबसे प्रमुख त्योहारों में से एक है। इस दिन भक्त विधि-विधान से गणपति बप्पा की पूजा-अर्चना करते हैं और घरों, पंडालों में गणेश जी की प्रतिमा स्थापित की जाती है। भगवान गणेश को विघ्नहर्ता, बुद्धि, ज्ञान और शुभता का देवता माना जाता है। इसलिए किसी भी शुभ कार्य से पहले गणेश जी का स्मरण करने की परंपरा है। मान्यता है कि गणेश जी का जन्म भाद्रपद शुक्ल पक्ष चतुर्थी को मध्याह्न काल में, सोमवार, स्वाति नक्षत्र एवं सिंह लग्न में हुआ था। इसलिए यह चतुर्थी मुख्य गणेश चतुर्थी या विनायक चतुर्थी कहलाती है। यह कलंक चतुर्थी के नाम से भी प्रसिद्ध है और लोक परम्परानुसार इससे डण्डा चौथ भी कहा जाता है।■ मान्यता है की इस दिन चंद्रमा का दर्शन नहीं करना चाहिए वरना कलंक का भागी होना पड़ता है। अगर भूल
से चन्द्र दर्शन हो जाए तो इस दोष के निवारण के लिए नीचे लिखे मन्त्र का 28, 54 या 108 बार जाप करे। श्रीमःद्भागवत के दसवें स्कन्द के 57 वें अध्याय का पाठ करने से भी चन्द्र दर्शन का दोष समाप्त हो जाता है। चन्द्र दर्शन दोष निवारण मन्त्रः सिंहःप्रसेनमवधीत् , सिहो जाम्बवता हतः। सुकुमारक मा रोदीस्तव, ह्येष स्यमन्तक:।।
■ ध्यान रहे कि तुलसी के पत्ते (तूलसी पत्र) गणेश पूजा में इस्तेमाल नहीं हों। तुलसी को छोड़कर बाकी सब पत्र-पूष्प गणेश जी को प्रिय हैं।
■ गणेश पूजन में गणेश जी की एक परिक्रमा करने का विधान है। मतान्तर से गणेश जी की तीन परिक्रमा भी की जाती है।अनंत चतुर्दशी (विसर्जन): 25 सितंबर 2026
हरतालिका तीज- 14 सितंबर मुहूर्त- सुबह 6:05 बजे से सुबह 7:06 बजे तक ।