अक्षय तृतीया 19 अप्रैल

 हिंदू धर्म में अक्षय तृतीया का अत्यंत विशेष महत्व माना जाता है। इस दिन किसी भी प्रकार के मांगलिक कार्य के लिए पंचांग या मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं पड़ती, इसलिए इसे अबूझ मुहूर्तों में शामिल किया जाता है। हर वर्ष यह पर्व वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है और इसे नई शुरुआत, समृद्धि और शुभ फल देने वाला दिन माना जाता है। इस वर्ष की अक्षय तृतीया और भी खास मानी जा रही है, क्योंकि ग्रहों की स्थिति के अनुसार कई शुभ योगों का निर्माण हो रहा है। इस दिन त्रिपुष्कर योग से लेकर गजकेसरी योग, मालव्य योग, लक्ष्मी नारायण योग, रवि योग, अक्षय योग आदि बन रहे हैं। इन सभी योगों के कारण इस दिन का महत्व कई गुना बढ़ जाता है। मान्यता है कि इस शुभ अवसर पर मां लक्ष्मी और भगवान कुबेर की पूजा करने से विशेष कृपा प्राप्त होती है, जिससे घर में सुख-शांति आती है और धन-समृद्धि में वृद्धि होती है।
इस दिन सोना-चांदी या अन्य कीमती वस्तुएं खरीदना भी अत्यंत शुभ माना जाता है, क्योंकि इसे स्थायी समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। इस दिन लोग देवी लक्ष्मी, भगवान गणपति और भगवान विष्णु की आराधना करते हैं। कई वैष्णव इस दिन उपवास रखते हैं और सामुदायिक भोज या दान-पुण्य का आयोजन करते हैं। भक्त गरीबों को फल, वस्त्र या अन्य  वस्तुएँ भी वितरित करते हैं।
🪷 :अक्षय तृतीया की पूजा विधि: 🪷
अक्षय तृतीया के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ-सुथरे वस्त्र धारण करें. इसके बाद एक चौकी पर माता लक्ष्मी और विष्णु जी की प्रतिमा स्थापित करें. दोनों की संयुक्त पूजा से इसका लाभ ज्यादा होता है. फिर भगवान विष्णु को चंदन और माता लक्ष्मी को कुमकुम का तिलक लगाएं. विष्णु जी को पीले और लक्ष्मी जी को कमल के फूल अर्पित करें. इसके बाद विष्णु जी और लक्ष्मी जी को जौ, गेंहूं, सत्तू, चने की दाल, गुड़, खीर या मीठे भात का भोग लगाएं।
आखिर में लक्ष्मीनारायण की कथा का पाठ करें।भगवान से हाथ जोड़कर मंगलकामना करें।