चतुर्थी तिथि 09 अक्टूबर रात 22.54 बजे से शुरू होगी
10 अक्टूबर की शाम 19:38 बजे इसका समापन होगा।
चंद्रोदय- 10 अक्टूबर को शाम को 19.42 मिनट पर होगा।
( शहरो के समयानुसार समय का कुछ फर्क़ हो सकता है)-करवा चौथ व्रत के नियम-
1 . यह व्रत सूर्योदय से पहले से शुरू कर चांद निकलने तक रखना चाहिए और चन्द्रमा के दर्शन के पश्चात ही इसको खोला जाता है
2. शाम के समय चंद्रोदय से 1 घंटा पहले शिव जी,पार्वती जी, नंदी जी,गणेश जी और कार्तिकेय जी (शिव परिवार) की पूजा की जाती हैं।
3. पूजन के समय भगवान की प्रतिमा का मुख पश्चिम दिशा की तरफ़ होना चाहिए
और सुहागन को पूर्व दिशा की तरफ़़ मुख करके बैठना चाहिए।
* करवा चौथ का इतिहास - जब देवताओं और राक्षसों के बीच युद्ध हो रहा था तब ब्रह्या जी ने सभी देवताओं की धर्मपत्नीयों को अपने पति के विजयी होने के लिए व्रत रखने को कहा था जिसके बाद से करवा चौथ का व्रत की परम्परा शुरु हुई।
*करवा चौथ पर सास अपनी बहुओं को व्रत से पहले थाल में सेब, संतरा, अनार, केले, नारियल, खीरा, मीठी मठरी, ड्राई फ्रूट्स, पराठा, मिठाई, चाय, जूस, मीठी सेवइयां, फेनी, और साबूदाने की खीर आदि देती हैं, जिसे "सरगी" कहते हैं।
करवा चौथ पर महिलाएं व्रत खोलने के बाद अपनी सासु मां को (यदि सासू मां मौजूद
ना हों, तो यह थाली जेठानी, ननद या किसी अन्य सुहागन महिला को दे ) करवा (मिट्टी या खांड का एक बर्तन, जिसमें गेहूं या शक्कर भरी होती है) इसके साथ साड़ी, चूड़ी, बिंदी, सिंदूर, मेहंदी, श्रृंगार का सामान, फल, मिठाई, ड्राई फ्रूट्स और दक्षिणा रखी जाती है, ये थाली सुहागन स्त्री के लिए होती है और पूजा के बाद, चंद्रोदय से पहले सासू जी को चरण स्पर्श करके आशीर्वाद के साथ दी जाती है, जिसे "बायना" कहा जाता है।