पूर्णिमा तिथि आरंभ-06 अक्टूबर दोपहर 12.24 मिनट पर
समापन- 07 अक्टूबर को सुबह को 09.18 मिनट पर होगा।
चंद्रोदय-शाम 19.40, स्थानीय समय कुछ भिन्न हो सकता है।
इस दिन पवित्र नदी या फिर घर पर ही जल में गंगाजल मिलाकर स्नान करें,
साफ वस्त्र धारण करें और व्रत व पूजा का संकल्प लें,भगवान श्री विष्णु ,
माता लक्ष्मी और चंद्र देव की पूजा करें। उन्हें सुंदर वस्त्र, फल, फूल, अक्षत, धूप, दीप
आदि अर्पित करें। खीर, मुरमुरे, गन्ने के टुकड़े, पान के पत्ते, कमल के फूल,सिक्के चढ़ाएं।
भगवान के सामने घी के दीपक जलाएं और घंटियों और शंख के साथ आरती करें।
इस दिन चंद्र देव को अर्घ्य जरूर दें।अर्घ्य में दूध, चावल और सफेद फूल मिलाएं।
पूर्णिमा के दिन अन्न, वस्त्र, चावल, दूध, मिठाई और दक्षिणा का दान जरूर करें।
मीठी खीर (दूध-चावल की खीर) तैयार करें और उसे चांदनी रात में (6 अक्टूबर रात)
खुले आसमान के नीचे रखें। यह खीर शरद पूर्णिमा की शीतलता और पोषण देने वाली चंद्र ऊर्जा को अवशोषित करती है, ऐसा माना जाता है कि अगली सुबह इसका सेवन करने से आंतरिक असंतुलन ठीक हो जाता है और शरीर में स्फूर्ति आती है। शरद पूर्णिमा की चांदनी को अमृत या उपचारात्मक ऊर्जा से भरपूर माना जाता है । पौराणिक मान्यतानुसार माना जाता है कि इसी रात भगवान श्रीकृष्ण ने गोपियों के साथ महारास रचाया था, साथ ही यह भी मान्यता है कि इस रात धन की देवी मां लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं और देखती हैं कि कौन जाग रहा है.इसीलिए इसे ‘कोजागरी’ पूर्णिमा भी कहते हैं.ऐसा माना जाता है कि पूर्णिमा की रात वह समय होता है जब देवी लक्ष्मी पृथ्वी पर उतरती हैं और उन घरों को आशीर्वाद देती हैं जो शुद्ध मन- भाव सें भक्ति में डूबे रहते